18 December 2013

यहाँ कमलनी खिलती है

वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजने का फैसला अकादमी के देर आयद पर दुरुस्त आयद की परंपरा के अनुकूल ही है. फिलहाल पढ़ते हैं उनकी एक कहानी. "यहाँ कमलनी खिलती है". : अखरावट  


वीराने में दो औरतें मौन बैठी थीं। पास-पास नहीं, दूर; अलग, दो छोरों पर असम्पृक्त। एक नजर देख कर ही पता चल जाता था कि उनका आपस में कोई सम्बन्ध न था; वे देश के दो ध्रुवों पर वास करने वाली औरतें थीं।
एक औरत सूती सफ़ेद साड़ी में लिपटी थी। पूरी की पूरी सफ़ेद; रंग के नाम पर न छापा, न किनारा, न पल्लू। साड़ी थी एकदम कोरी धवल, पर अहसास, उजाले का नहीं, बेरंग होने का जगाती थी। मैली-कुचैली या फिड्डी-धूसर नहीं थी। मोटी-झोटी भी नहीं, महीन बेहतरीन बुनी-कती थी जैसी मध्य वर्ग की उम्रदराज़ शहरी औरतें आम तौर पर पहनती हैं। हाँ, थी मुसी-तुसी। जैसे पहनी नहीं, बदन पर लपेटी भर हो। बेख़याली में आदतन खुँसी पटलियाँ, कन्धे पर फिंका पल्लू और साड़ी के साथ ख़ुद को भूल चुकी औरत। बदन पर कोई ज़ेवर न था, न चेहरे पर तनिक-सा प्रसाधन, माथे पर बिन्दी तक नहीं। वीराने में बने एक मझोले अहाते के भीतर बैठी थी वह। चारों तरफ से खुला, बिला दरोदीवार, गाँव के चौपाल जैसा, खपरैल से ढका गोल अहाता।
दरअसल, वीराना वीरान था भी और नहीं भी। दो बीघा जमीन का टुकड़ा, दो फुट ऊँची चाहरदीवारी से घिरा था। दीवार इंसान की बनाई हुई थी, इसलिए उसे वीराने का हिस्सा नहीं माना जा सकता था। पर उसकी गढ़न स्त्री की साड़ी जैसी बेरंग-बेतरतीब थी; यूँ कि उसका होना-न होना बेमानी था। वह बस थी; पेड़-पत्तों से महरूम, उस खारी धरती की निर्जन सारहीनता को बाँध, कम करने के बजाय बढ़ा रही थी। उस जमीन को घेरते वक्त, घेरने वाले का इरादा, उसे आबाद करने का नहीं था। दिल की वीरानी को हरदम रौंदते यादों के काफिले को जीते-जीते, बाक़ी की जिंन्दगी जीने की कूवत पैदा करने के लिए, जिस एकान्त की जरूरत होती है, उसी को निजी बनाने की कोशिश थी। कभी-कभी सुकून पाने को वीराने में ही ठौर बनाना पड़ता है; वैसा ही ठौर था वह मझोला छाजन।
पर अचरज, इंसानों को बसाने का जज्बा भले न रहा हो, फूलते-फलते पेड़ लगाने का इरादा जरूर था। इरादा कि उम्मीद! जिद या दीवानगी! जो था, कारगर न हुआ। धरती में खार की पहुँच इतनी गहरी थी और निकास के अभाव में, बरसात के ठहरे पानी की मियाद इतनी लम्बी कि पेड़ों का उगना, मुश्किल ही नहीं, करीब-करीब नामुमकिन था। कुछ झाऊं और कीकर जरूर उग आते थे जब-तब। पर जब और तब के बीच का फासला इतना कम होता कि पता न चलता, कब थे कब नहीं। उगते, हरसाते, ललचाते और मुक्ति पा जाते। जब पहले-पहल, पहला झाऊं उगा तो बड़ी पुख्तगी के साथ इरादा, उम्मीद बना कि बस अब वह भरे भले नहीं पर जंगली पेड़ वहाँ हरे जरूर होंगे। और उसके एकाध साल बाद, जमीन ममतामयी हुई तो फलदार पेड़ भी उग सकेंगे। झाऊं के बाद कीकर उगे तो उम्मीद भी उमगती चली गई, अंकुर से पौध बनती। सरदी पड़ने पर कीकर पीले पड़ कर सूख गये; झाऊं भी गिनती के दस-बीस बचे। तब भी उम्मीद ने दम न तोड़ा। लगा इस बरस पाला ज्यादा पड़ गया, अगली बार सब ठीक हो जाएगा। जब अगले बरस भी सिलसिला वही रहा तो धीरे-धीरे, जंगली पौधों के पेड़ बनने से पहले गलने-सूखने के साथ, उम्मीद क्या, ज़िद तक दम तोड़ गई।
दूसरी औरत छाजन के बाहर, चहारदीवारी के भीतर बैठी थी, हैंड पम्प के पास। फिसड्डी, पैबन्द लगी कुर्ती और ढीली सलवार पहने थी। अर्सा पहले जब नया जोड़ा बना था तो रंग ठीक क्या रहा होगा, कहा नहीं जा सकता था। और जो हो, सफेद वह कभी नहीं था। मैला-कुचैला या बेतरतीब फिंका हुआ अब भी नहीं। दुरुस्त न सही चुस्त जरूर था, देह पर सुशोभित। सीधी तनी थी उसकी मेहनतकश देह, उतनी ही जितनी पहली की दुखी-झुकी-लुकी। ज़ाहिर था वह निम्न से निम्नतर वर्ग की औरत थी। गाँव की वह औरत, जो दूसरों के खेतों पर फी रोज मजदूरी करके एक दिन की रोज़ी-रोटी का जुगाड़ करती है पर खुदकाश्त जमीन न होने पर भी रहती किसान है। जमीन से जुड़ाव में; अपनी भाव-भंगिमा में। वह इस ऊसर धरती के साथ पली-बढ़ी थी। उसे उपजाऊ से खार होते देखा था। कोई नहर बनाई थी सरकार ने। पर पानी के निकास का सही बन्दोबस्त न होने पर खार इधर के खेतों की तरफ दौड़ा था और हरियल धरती को कल्लर बना कर छोड़ा था। आदमकद पेड़ उगाने की न उसने कभी उम्मीद की, न किसी और ने जिद। उसने आस लगाई तो बस कमतर श्रेणी का धान उगाने वाले खेतिहरों की फसल की बुवाई-कटाई की, जो कमोबेश पूरी होती रही, दो-एक सालों के फासले पर। जब सूखा पड़ता और फसल सिरे से गायब हो जाती तो सरकार राहत के लिए जहाँ सड़क-पुल बनाती, वहीं मजूरी करने चली जाती। जिस दिन मजूरी नहीं, उस दिन कमाई नहीं; रोटी नहीं। बिला काम-धाम, आराम से बैठने की उसे आदत न थी। सोने और जागने के बीच सिर्फ काम का फासला जानती थी, इसलिए चन्द मिनट बेकार क्या बैठी, आप से आप आँखें मुँद गईं। इतनी गहरी सोई कि ओढ़नी बदन से हट, सिर पर टिकी रह गई। निस्पंद बैठे हुए भी उसकी देह जिंदगी की थिरकन का भास देती रही। साँस का आना-जाना, छाती का उठना-गिरना, मानो उसकी रूहानियत के परचम हों।
कल उसने दूनी मजदूरी करके, घरवाले और बच्चे के लिए कुछ रोटी-प्याज बचा रखा था कि आज काम पर न जा, यहाँ बैठ पाए। ऐसा भाग कम होता था कि एक दिन में दो दिनों के गुजारे लायक अन्न जुट जाए। सबकुछ बरखा भरोसे जो था। सचमुच पिछले दो बरस बड़भागी बीते थे। पिछले बरस भी बरखा इतनी हो गई थी कि धान की फसल ठीक-ठाक हो और उसे कटाई का काम मिलता रहे। और इस बरस... इस बरस तो यूँ टूट कर बरसा था सावन कि बिला खेत-जमीन, हरिया लिया था जिया। तभी न कल दूनी मजदूरी का जुगाड़ हुआ और आज यहाँ बैठने आ पाई। जानती थी पहली औरत आज आएगी; पिछले दो बरसों से आ रही थी।
मुँदने से पहले उसकी आँखें दीवार के परली तरफ टिकी थीं। दीवार की बाँध में बँध कर, उधर की निचली जमीन के गड्डों-खड्डों पर, उमग-घुमग कर बरसा पानी जो ठहरा, तो भरा-पूरा पोखर बन लिया। और उसमें खिल आए कमलनी के अनगिन फूल। जहाँ तक वह जानती थी; और इस इलाके के बारे में शायद ही कुछ था जो वह नहीं जानती थी; तो इस बरस से पहले, किसी बरस यहाँ कमलनी नहीं खिली थी।
हे मैया, अजब माया है थारी! इस बरस कमलनी भी यों खिली ज्यों बरसा पानी; अटाटूट। देवी पारवती का चमत्कार नहीं तो क्या कहें इसे? वह जाने थी भली भाँत, पारवती के कहे पर ही खिली थी कमलनी यूँ घटाटोप। कहा होगा शिवजी से कि प्राणप्यारे खिला दो, छोरी खातिर उसकी नाईं कमलनी। बाबा शंकर मना करते तो कैसे; सूरत छोरी की ज्यों पारवती की परछाईं। दिप-दिप मुख पर देवी जोगी मुस्कान लिए खत्म हुई थी; पल भर को जो छोरे का हाथ अपने हाथ से छूटने दिया हो। जैसे ही गाड़ी ट्रेक्टर से टकराई, सोने से छोरा-छोरी मिट्टी हो गए। यह औरत, जो दो बरस से यहाँ आया करे है; जने क्या सोच बंजर को आड़ दे, बीज छींटा करे है, छोरे की माँ है।
सफेद झुकी औरत की आँखें उसकी देह की तरह बेजान नहीं थीं। जब-तब उनमें यादों का बरसाती अंधड़ सरगोशियाँ कर उठता। कभी काली आँधी की किरकिर धूल तो कभी साँवले मेह की झिलमिल टपकन। प्यार से पगे पल की याद कुलांच भरती कि विरह से सना उपरांत लपक कर उसे दबोच लेता।
वह उन्हें पूरा नहीं खोलती थी, न इधर-उधर ताकने की इजाजत देती थी। निगाहें यूँ नीचे झुकी रहतीं जैसे अपने दुख पर शर्मिन्दा हों। पर इधर-उधर न देखने की कोशिश जितनी करे, प्रकृति को पूरी तरह पछाड़ कहाँ पाती थी? गाहे बगाहे नजर फिसल ही जाती, यहाँ-वहाँ। उसकी दूसरी कोशिश भी नाकाम रहती। बोझिल अधखुली आँखों को पूरी तरह मूँद, यह उम्मीद करने की, कि इस वीराने में यादों के भंवर में डूब, नींद आ जाएगी। एकाध दफा यह तो हुआ कि भंवर से दो-एक खुशनुमा लम्हे जेहन में उभरे और बरबस ओंठों पर हल्की मुस्कराहट तिर गई। पर ज्यादा देर टिकी नहीं... अनचाहे-मनचाहे उगे झाऊं-कीकर की तरह समाधिस्थ हो गई। बची रही चीखती-चीरती एक आवृत्ति...पहले गुजरी इस तिथि की...
कभी ऐसा भी हुआ कि अधखुली आँखों से उसने उम्मीद के इस वीराने को फल-फूल से लदा देख लिया। बेर, कैर, करौंदों से ही नहीं, जामुन और आम के झुरमुट से हरियाया। पर भ्रम रहा भ्रम ही; दीवानगी में भी वह जाने रही कि वह दीवानगी थी, असलियत या सच्चाई नहीं। उन जबरन मुंदी, अधमुंदी आँखों में जब नींद कभी न आई तो सपने कैसे आते? नहीं आए इसी से दीवानगी को दीवानगी जाने रही और वीराने को वीराना।
अब भी, हमेशा की तरह, उसने जबरन आँखें मूँदीं तो छलावे-सी मायावी, नामालूम-सी खुशबू ने पलकों पर दस्तक दी। कहाँ से आई खुशबू? क्या आँख लग गई, सपना आ बैठा उसके रूमाल का रूप ले, भीगी पलकों पर? आँखें औचक खुलीं तो इधर-उधर भटक भी लीं।
उसने देखा... जमीन को घेरे जो दो फुटी दीवार खड़ी थी, उसके दूसरी तरफ बाहर पानी ही पानी था। इतना पानी! हाँ होता है, देख चुकी है न दो बार। बरसात होने पर, उम्मीद का यह वीरान बगीचा, पानी से भरा उथला नाला बन, खुद अपने पेड़-पौधों को निगल जाता है। पर यह मौत का साया फेंकता पानी नहीं, कुछ और है। इसमें तो बेशुमार कमलनी खिली हैं! दर्जनों, बीसियों, सैंकड़ों की तादाद में। वह चौंक कर खड़ी हो गई। कमलनी! यहाँ, जहाँ कभी कुछ खिलता नहीं। समझी! आखिरकार उसे नींद आ ही गई और यह सलोना सपना दिखला गई।
मन्त्र मुग्ध वह उठी और यन्त्र-बिद्ध कदमों से दीवार के पास पहुँच गई। कमलनी बदस्तूर खिली रही; मन के तिलिस्मी पेड़ों की तरह बिलाई नहीं। उस पार जाने के लिए वह दीवार में, हैंड पम्प के पास बनी, फाँक की तरफ बढ़ी तो वहाँ एक स्त्री मूर्ति देख, स्तब्ध-अवसन्न रह गई। कहाँ से आई यह प्रतिमा, उसने तो लगवाई नहीं, करुणा से ओतप्रोत देव-मूर्ति... तब... कौन लगा गया... किसने तराशी ऐसी दिलकश... उसकी साँस रुक गई... मूर्ति की छाती उठती-गिरती साँस से हिल रही थी। यह तो... जिन्दगी की हलचल से लबालब, बादामी आँखें पूरी खोल सपनों में खोई... उसकी बहू थी? दिंन्दा?
पर उसे तो उसने ख़ुद अपने हाथों...
सिर में घुमेर उठी और वह चक्कर खा वहीं उसके बराबर में ढह गई। पसीने से तरबतर बदन से चिपकी साड़ी का पल्लू कन्धों से लरज, दूसरी औरत की ओढ़नी की तरह जमीन पर बिछ गया। वह बेखबर उठँगी पड़ी रही। उस औरत ने करुण वात्सल्य से भीगी दृष्टि उस पर डाली पर अपनी जगह से हिली नहीं; सहारा दे उसे उठाया नहीं।
सिर हाथों में थाम, उसने खुद को सम्भाला और अपनी उसी झुकी, दुखी, जीवन से हताश, मुक्ति की तलाश में दिग्भ्रमित मुद्रा में बैठ गई। निगाह बरबस ऊपर उठी तो दूसरी औरत की स्निग्ध नजर से जा टकराई।
नजर के साथ चेहरा आँखों की राह जेहन में पहुँचा तो हाहाकार करते दिल ने समझा, वह नितान्त अजनबी औरत थी। निश्चल रह कर भी, अपनी साँसों के स्पंदन से उस निष्कम्प सन्नाटे को आबाद कर रही थी। खुली बादामी आँखों, उसी मंजर को ताक रही थी, जिसे सपना जान, मोहपाश में बँधी, वह फिर-फिर देखने की पगलाई ख्वाहिश लिए, चली आई थी। उनकी साझा नजरों के सामने हर तरफ कमलनी ही कमलनी थी।
दोनों पास-पास मौन बैठी, एक दिशा में ताक रही थीं। पहली औरत अपने से बेखबर थी और दूसरी से भी; पर दूसरी, पहली से पूरी तरह खबरदार थी। स्नेहिल, ममता में रची-पगी दृष्टि, जब-तब उस पर डाल, वापस कमलनी के घटाटोप की तरफ़ मोड़ लेती।
कितना वक्त गुजराः कुछ पल, चन्द लम्हे, एक घन्टा, एक पहर; कौन हिसाब रखता। बेखयाली में गुम पहली औरत भला क्या कयास लगाती, कितने बरस बीते वहाँ? लगा, रेत की मानिन्द हाथों से फिसली पूरी जिन्दगी बीत ली। याद आया, यहाँ साँप के एक जोड़े ने बसेरा किया था। केंचुल छोड़ एक दिन सरक लिए। फिर नहीं लौटे। मोर-मोरनी भी भटक आए थे एक बार, जब बरसात से पहले, कुछ पेड़ उम्मीद बन उगे थे। वे भी चले गए न लौटने के लिए। वही बार-बार लौट आती है यहाँ। कब हुआ था वह सब? क्या पिछले साल ही? अब कहाँ थे वे? यहीं कहीं थे आस-पास या गये? सब गए; सब के सब?
दूसरी बेखबर नहीं थी। आश्वस्त थी कि दिन ढलने में अभी वक्त था। साँझ उतरने पर, जब कमलनी पँखुड़ियाँ समेटना शुरू करेगी, तभी घर पलट पाएगी, सोच कर ही वीराने में पाँव रखा था। उसे पता था, छोरे की माँ छोरे की पुन्न तिथि पर साँझ घिरने पर ही वहाँ से पलटती थी। कमलनी कल फिर खिलेगी; सूरज उगने के साथ। पर पारवती अपने शिव को साथ ले जो गई सो गई। दो बरस बाद ये सौगात भेजी माँ के लिए; ढेरोढेर कमलनी के फूल। यहीं से पानी ले जाती थीं गाँव भर की औरतें। इस बरस हर जबान पर यही नाम था; जहाँ कमलनी खिलती है।
बरसात बाद के अगहन महीने की दुपहरी का तेज ताप, जिसमें हरिण भी काले पड़ जाते हैं, मद्धिम पड़ना शुरू हुआ तो दमकती-चमकती कमलनी, स्त्री की आर्द्र दृष्टि की तरह सौम्य दीखने लगीं। उसने अचकचा कर ऊपर आसमान की तरफ देखा; हाँ, सूरज चलाचली की ओर बढ़ रहा था। उसने ओढ़नी सिर से खींच, पूरा बदन ढका और असमंजस भरी निगाह से पास बैठी औरत को निहारा। निहोरा अब भी था उसमें पर हल्की दुविधा का भास लिए।
थिर मूरत में हरकत हुई तो पहली औरत मायाजाल से निकल ठोस जमीन पर आ गिरी। पर कमलनी... वे तो अब भी खिली थीं। कुछ सिमटी-सकुचाई जरूर थीं, नई दुल्हिन की तरह। पर थीं सब की सब वहीं; मगन मन पानी के ऊपर तैरती। नहीं, मायावी नहीं था वह लोक जिसमें विचर, वह अभी-अभी लौटी थी। कमलनी थीं, वाकई थीं।
बेध्यानी टूटी तो जो पहले नहीं सूझा था, अब सोच बैठी। कौन थी वह औरत; यहाँ क्यों बैठी थी? हैंड पम्प से पानी लेने आई होगी। इस खारे इलाके का पानी भी खारा था; कुओं का ही नहीं, गहरे खुदे नल कूप का भी। वह खुदवा कर देख चुकी थी। मीठा पानी सिर्फ सरकार की कृपा से मिलता था। उसकी जमीन पर था मीठे पानी का एक हैंड पम्प। उसी ने कह-सुन कर लगवाया था। सुबह सकारे गाँव की औरतें उससे पानी भरने आती थीं। पर इतनी देर रुक-ठहर कोई बैठती न थी। भागती-दौड़ती आईं, पानी भरते-भरते आपस में दो बोल बोले और चल दीं। कभी वह नजर आ गई तो शर्मीली-सी दुआ-सलाम उससे भी कर ली,बस।
उठने-उठने को होती दूसरी औरत बैठी थी अब तक। पर उसके बदन की कसमसाहट पहली को उठने पर आमादा कर रही थी। क्या वे किसी काम के सिलसिले में आपस में टकराई थीं? याद आया, एक बार, एक स्वयंसेवी संस्था से दो औरतें यहाँ आई थीं; गाँव की औरतों को क्या-कुछ बतलाने। बड़ी मुश्किल से औरतों को इकट्ठा किया था पर बात आगे बढ़ी न थी। कैसे बढ़ती? औरतें चाहती थीं रोजगार और वे देती थीं, मात्र सलाह। तो... उसने क्या किया? कुछ नहीं। सोचा भी नहीं कि कुछ कर सकती थी।
फिर एक बार... अरे पिछले बरस ही तो, धान की थोड़ी-सी फसल भी हुई थी इस जमीन पर; कुछ औरतें काट ले गई थीं। उनमें रही होगी यह भी। पर... आज... एक बरस बाद... इतनी देर से यहाँ क्यों बैठी है? कौन है यह, क्यों है?
कौन हो सकती है? गरीब घर की किसान औरत, और क्या। पर... आँखों से झरती कण-कण अनुकम्पा; सीधी-तनी-कृश देह से तरंगित वत्सल राग? पेबन्द लगी फिड्डी पोशाक में दिपदिप करती देवी-सी आकृति... उसकी बहू... नहीं पार्वती है यह साक्षात! वही... वही... और कोई नहीं...
कुछ पल गुजरे...एक पहर और बीता...
सूरज अवसान की तरफ़ बढ़ा, कमलनी सकुचाईं, मायाजाल तिड़कता चला गया। इतना कि तमाम संकोच-झिझक के बावजूद, सपनलोक से बेवफाई कर, वहजमीनी सवाल कर बैठी।
"कुछ चाहिए?"
"ना,"
उसने कहा," सोचा, इकली कैसे बैठोगी।"

7 December 2013

मंडेला ने पूरे महाद्वीप को माफ़ करना सिखाया

जॉन द्रमनी महामा घाना के राष्ट्रपति हैं. वे कई किताबों के लेखक भी हैं. मंडेला  की  स्मृति में उनका यह लेख न्यूयार्क टाइम्स में छपा है. अखरावट 



कई वर्षों तक ऐसा लगता रहा कि नेल्सन मंडेला की सिर्फ एक तसवीर ली गयी है. इसमें नेल्सन मंडेला के बाल बिखरे हुए से थे. गाल भरा हुआ था. उनकी निगाहों में एक गहरी प्रतिबद्धता को महसूस किया जा सकता था. लेकिन, यह एक ब्लैक एंड व्हाइट तसवीर थी. यह काफी धुंधली थी और काफी पुरानी नजर आती थी.  यह एक ऐसे व्यक्ति के दस्तावेज के समान थी, जिसका वक्त अरसा पहले बीत चुका था.

    1960 के दशक के शुरुआती दिनों में अफ्रीकी मूल निवासियों के साथ किये जा रहे बर्बर व्यवहार और दमन से आजिज आकर, मंडेला ने सफलतापूर्वक गुरिल्ला युद्ध की हिंसक योजना प्रस्तावित की थी. इसके मूल में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की सैन्य शाखा के गठन का विचार था. अपने गठन के कुछ वर्षों के भीतर ही, इस सैन्य इकाई, जिसे देश की बरछी (उमकोंतो वी सिजवे) नाम दिया गया था, का पता लग गया और इसके शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. 1964 में मंडेला को देश-द्रोह का दोषी करार दिया गया और उन्हें आजन्म कारावास की सजा सुना दी गयी. 

    मुकदमे की सुनवाई के दौरान, अपने वक्तव्य में मंडेला ने कहा था, ‘ मैंने हमेशा से एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र समाज की कामना की है, जिसमें सभी लोग समभाव और बराबरी के मौके के साथ रह सकें.’ उन्होंने कहा, ‘यह वह आदर्श है, जिसके लिए मैं जीना चाहता हूं और जिसे मैं हासिल करना चाहता हूं. और अगर जरूरत पड़ी, तो इस आदर्श के लिए मैं अपने प्राणों की कुर्बानी देने को भी तैयार हूं.’ मैं तब महज पांच साल का था, जब मंडेला कैदी नंबर 46664 बने थे और उन्हें उनके जीवन के बचे हुए हिस्से को रॉबेन द्वीप पर बिताने के लिए भेज दिया गया था. रॉबेन द्वीप केप टाउन के ठीक उत्तर में स्थित महज पांच वर्गमील का जमीन का टुकड़ा है. यहां कुष्ठ रोगियों की एक बस्ती थी, एक पागलखाना था और कई जेल थे. यह निर्वासन, सजा और अलगाव की भूमि थी. यहां लोगों को भेजा जाता था और भुला दिया जाता था.

    लेकिन, उस फोटोग्राफ की चीखती हुई छवि ने हमें भूलने नहीं दिया. 1970 के दशक में मैं अफ्रीकी यूथ कमांड का सदस्य था. यह सामाजिक और राजनीतिक अन्यायों के खिलाफ विरोध करनेवाले कार्यकर्ताओं का एक समूह था. हम मंडेला को अपना आदर्श मानते थे. हम उस फोटोग्राफ के पोस्टर्स को अपने डॉरमिट्री के कमरों में टांगते थे. हम उस तसवीर को परचों पर छापते थे. हमने मंडेला को अप्रासंगिकता के बियाबान में गुम हो जाने देने से इनकार कर दिया. हमने मार्च निकाले, प्रदर्शन किये, कंसर्ट्स का आयोजन किया, बहिष्कार किया, याचिकाओं पर दस्तखत किये. प्रेस वक्तव्य जारी किया. रंगभेद की बुराई का विरोध करने के लिए और मंडेला का नाम लोगों की जुबान पर बनाये रखने के लिए, हमसे जो कुछ बन सकता था, हमने वह सब किया. यहां तक कि हमने सरकार की इजाजत से श्वेत श्रेष्ठता का प्रचार करनेवाले जॉन वॉर्स्टर, जिमी क्रूगर जैसे नेताओं का पुतला भी जलाया.

अफ्रीकी महाद्वीप पर आजादी, एक हकीकत थी, जिसके लिए हम संघर्ष करने को तैयार थे. लेकिन, इसके बावजूद हम लोगों ने कहीं न कहीं अपने मन को समझा दिया था कि मंडेला अपने जीवन की आखिरी सांस तक जेल में ही रहेंगे और हमारे जीवन के खत्म हो जाने के बाद भी दक्षिण अफ्रीका में समानता का राज स्थापित नहीं होगा. तब, 11 फरवरी, 1990 को एक चमत्कार हुआ. मंडेला जेल से बाहर चल कर आये.
दुनिया इस क्षण को देखकर थम गयी. हमारे लिए यह कल्पना करना कठिन था कि अगर हम मंडेला की जगह होते, तो हम क्या करते? हमसब एक बखान न किये जा सकनेवाले गुस्से, बदले की कार्रवाई का इंतजार कर रहे थे. किसी भी तार्किक दिमाग के लिए इसका औचित्य समझना शायद कठिन नहीं होता. उनके जीवन के 27 साल नष्ट हो गये थे. चमकते हुए निर्दयी सूरज के नीचे चूना-पत्थर के खदान में हर रोज काम करने से, वह भी बिना किसी सुरक्षा चश्मे के,  उनकी आंसुओं की ग्रंथियां नष्ट हो गयी थीं.. इसने वर्षों तक मंडेला से रोने की क्षमता से भी महरूम कर दिया. लेकिन, इसके बावजूद, इस व्यक्ति ने माफ कर देने की वकालत की.  ‘अपने दृढ़ विश्वास के कारण जेल जाना और जिस चीज में आप यकीन करते हैं, उसके लिए हर कष्ट को सहने के लिए तैयार रहना, अपने साथ ज्यादती नहीं है. परिणामों की परवाह किये बगैर धरती पर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना किसी व्यक्ति की सफलता है.’

    जब मैं पहली बार मंडेला से मिला, तब तक उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा जा चुका था. वे उस देश के राष्ट्रपति चुन लिये गये थे, जिस धरती पर उन्हें और दूसरे सभी अश्वेत लोगों को कुछ समय पहले तक मताधिकार से वंचित रखा गया था. वे एक आइकॉन बन गये थे- सिर्फ आशाओं के ही नहीं, बल्कि जख्मों के भरने की संभावना के भी.
    मैं तब राजनीति में नया था. संसद का सदस्य और संचार मंत्री था. यह केप टाउन की मेरी पहली यात्रा थी. मैं दोस्तों के साथ काफी देर बाहर रहा था और होटल के अपने कमरे तक जाने के लिए लिफ्ट का इंतजार कर रहा था.  जब लिफ्ट का दरवाजा खुला, तो सामने मंडेला थे. मैं एक कदम पीछे हट गया. उस घड़ी मैं जम सा गया था.  जब मंडेला बाहर निकले, तब उन्होंने मेरी तरफ देखा और अपना सिर हिलाया. मैं उनके इस शिष्टाचार का जवाब नहीं दे पाया.  मैं अपनी जगह से हिल नहीं पाया, न ही पलकें झपका पाया. मैं बस स्तब्ध सा वहां खड़ा रहा, यह सोचते हुए कि मेरी आंखों के सामने वह व्यक्ति था, जिसके लिए हमने मार्च निकाले थे, गाने गाये थे, आंसू बहाये थे. यह उस ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफ में जज्ब हो गया व्यक्ति है. यहां वह व्यक्ति था, जिसने दक्षिण अफ्रीका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे अफ्रीका महाद्वीप की नयी नैतिक धुरी का निर्माण किया था.

यह महज संयोग नहीं है कि मंडेला की जेल से रिहाई के बाद के वर्षों में अफ्रीका का एक बड़ा हिस्सा लोकतंत्र और कानून के शासन की ओर मुड़ता गया.  मंडेला ने जिस तरह से शांति का प्रयोग आजादी के लिए किया, उसने अफ्रीका को यह दिखाया कि अगर हमें  उपनिवेशवाद द्वारा पैदा किये गये बंटवारे और खुद अपने द्वारा दिये गये जख्मों से बाहर निकलना है, तो दयालुता और क्षमा करने की भावना को गवर्नेंस का अहम हिस्सा बनना होगा. लोगों की तरह की देशों को भी अपने पर गुजरे दुखों को समझना चाहिए और उन्हें दूर करने के लिए रास्तों की खोज करनी चाहिए. यह टूटे हुए को फिर से एक बनाने के लिए जरूरी है.

उस रात मैंने मंडेला को अपने बगल से गुजरते हुए देखा था. मैं समझता हूं कि उनकी कहानी- ‘आजादी का लंबा रास्ता’ (द लांग वॉक टू फ्रीडम), अफ्रीका महाद्वीप की भी कहानी थी. किसी जमाने में हमारे महाद्वीप पर जिस घृणा की भावना का बोलबाला था, उसकी जगह आज प्रेरणा (इंसपिरेशन) ने ले ली है. युद्ध, तख्तापलट, रोग, गरीबी और अत्याचार के दुखों के हमले के कारण महाद्वीप में बहनेवाली निराशा की अंत:धारा का स्थान एक टिकाऊ और लगातार विस्तार लेते हुए संभावनाओं के एहसास ने ले लिया है.
जब नेल्सन मंडेला जेल में थे, तब सिर्फ उनका ही रूपांतरण नहीं हो रहा था, हम सभी उन वर्षों में बदल रहे थे. और अफ्रीका आज अगर बेहतर हुआ है, तो उसमें इसकी बड़ी भूमिका है.

30 November 2013

भारतीय सौन्दर्य और प्रेम का जादू - ''रूप'' की रुबाईयाँ

 फिराक गोरखपुरी पर बहुत ही आत्मीयता और दिल की लहर में  बहते हुए लिखा है मनीषा कुलश्रेष्ठ ने. आप भी पढ़िए और आनंद लीजिये। अखरावट 
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रूप जैसी बहुचर्चित और लोकप्रिय तथा एक मील पत्थर साबित हुई सौन्दर्यमय, संगीतमय पुस्तक का सूत्रपात द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में हुआ था। एक रुबाई से आरंभ हुआ यह संग्रह 100 दिनों में साढे तीन सौ से ज्यादा रुबाईयों का संग्रह बन गया था। उर्दू के प्रख्यात शायर स्वयं फिराक गोरखपुरी कहते हैं कि रूप की रुबाईयों में नि:स्संदेह एक भारतीय हिन्दू स्त्री का चेहरा है, चाहे रुबाईयाँ उर्दू में क्यों न लिखी गई हों। रूप की भूमिका में वे लिखते हैं -
" मुस्लिम कल्चर बहुत ऊंची चीज है, और पवित्र चीज है, मगर उसमें प्रकृति, बाल जीवन, नारीत्व का वह चित्रण या घरेलू जीवन की वह बू–बास नहीं मिलती, वे जादू भरे भेद नहीं मिलते जो हिन्दू कल्चर में मिलते हैं। कल्चर की यही धारणा हिन्दू घरानों के बर्तनों में, यहाँ तक कि मिट्टी के बर्तनों में, दीपकों में, खिलौनों में, यहाँ तक कि चूल्हे चक्की में, छोटी छोटी रस्मों में और हिन्दू की सांस में इसी की ध्वनियाँ, हिन्दू लोकगीतों को अत्यन्त मानवीय संगीत और स्वार्गिक संगीत बना देती है।
बाबुल मोर नइहर छुटल जाए
ऊ डयोढी तो परबत भई, आंगन भयो बिदेस
यह तो हमें गालिब भी नहीं दे सके, इकबाल भी नहीं दे सके, चकबस्त भी नहीं दे सके। इधर आईए, रूप की रुबाईयों में भारतीयता किस तरह सांस ले रही है, इसका कुछ कुछ अंदाजा होगा। हिन्दू संस्कृति किसी एक अवतार या पैगम्बर या धार्मिक ग्रन्थ की देन नहीं है। यह संस्कृति संपूर्ण भारत के सामूहिक जीवन से क्रमश: उगी है। भौतिकता और आध्यात्म का समन्वय इस संस्कृति की विशेषता है।"

और फिराक ने सच ही लिखा था ये रुबाईयाँ नहीं भारतीय स्त्री के सौन्दर्य का जादू हैं।
है रूप मैं वो खटक, वो रस, वो झंकार
कलियों के चटकते वक्त जैसे गुलजार
या नूर की उंगलियों से देवी कोई
जैस शबे-माह में बजाती हो सितार

ये रंगे निशात, लहलहाता हुआ गात
जागी जागी सी काली जुल्फ़ों की रात
ऐ प्रेम की देवी बता दे मुझको
ये रूप है या बोलती तसवीरे हयात
वैसे रुबाई अरबी भाषा का शब्द है। रुबाई संगीतपूर्ण काव्यकला है। रुबाई में चार पंक्तियां होती हैं, पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति का तुकान्त काफिया एक सा होता है। तीसरी पंक्ति तुकान्त से मुक्त होती है। कभी चारों ही एक से तुकान्त वाली होती हैं। रुबाई का एक विशेष छन्द होता है। रूप में रुबाई कला के बारे में लिखते हुए कहा गया है कि - '' रुबाई की चारों पंक्तियां एक सम्पूर्ण कविता होती है और पहली ही पंक्ति से रुबाई अपनी प्रत्येक पंक्ति द्वारा लहरों की तरह उठती है और चौथी पंक्ति में अंतिम लहर तट को चूम लेती है।'' कहते हैं रुबाई लिखने की कला बडी ज़टिल व सूक्ष्मता से परिपूर्ण होती है जैसे हाथी दांत पर बारीक नक्काशी, इसे कहना या लिखना हरेक के बस की बात नहीं। गालिब और इकबाल भी इस क्षेत्र में अच्छी कृतियां न दे सके। फिराक गोरखपुरी को रुबाई लिखने वाले गिने चुने सिद्धहस्तों में गिना गया है। रूप की रुबाइयों में जहाँ यौवन, प्रेम और अथाह सौन्दर्य का सागर बहा है वहीं लौकिक में अलौकिक चेतना के समन्वय का दार्शनिक रूप भी दृष्टिगोचर होता है।
नभ मण्डल गूंजता है तेरे जस से
गुलशन खिलते हैं गम के खारो खस से
संसार में जिन्दगी लुटाता हुआ रूप
अमृत बरसा रहा है जोबन रस से।
फिराक की इन संगीतमय रुबाइयों में अपने यौवन से बेखबर कमसिन किशोरी से लेकर, प्रेमिका, भांवरे लेती परीणीता, सुहागरात को लाज से भरी नव वधू, सुहागरात के बाद स्नान करती वधु, सद्यस्नात: स्त्री, विरहिणी, भाई को राखी बांधती, बच्चे को नहलाती, दुलराती मां, सारे त्यौहार पूरी श्रद्धा से मनाती हुई गाय को पुचकार कर चारा खिलाती, रामायण पढती भारतीय हिन्दू स्त्री के हर रूप की छब बडे ही भाव भीने शब्दों में बांध कर रख दी गई है। एक एक रुबाई प्रेम और सौन्दर्य का छलकता हुआ अमृत पात्र है।
माथे की यह कहकशां ये जोबन की लहर
पडते ही झपक झपक जाती है नजर
वो रूप जहां दोनों समय मिलते हों
आँखों में सुहागरात, मुखडे पर सहर

चढती हुई नदी है कि लहराती है
पिघली हुई बिजली है कि बल खाती है
पहलू में लहक के भींच लेती है वो जब
न जाने कहाँ बहा ले जाती है

चढती जमुना का तेज रेला है कि जुल्फ़
बल खाता हुआ सियाह कौंदा है कि जुल्फ़
गोकुल की अंधेरी रात देती हुई लौ
घनश्याम की बांसुरी का लहरा है कि जुल्फ़
खुश्बू से मशाम आँखों के बस जाते हैं
गुंचे से फिजांओं में बिकस जाते हैं
झुकती है तेरी आँख सरे - खलवते - नाज
या कामिनी के फूल बरस जाते हैं।

गंगा वो बदन कि जिसमें सूरज भी नहाये
जमुना बालों की, तान बंसी की उडाय
संगम वो कमर, आँख ओझल लहराय
तहे-आब सरस्वती की धारा बल खाय
एक स्त्री के सौन्दर्य को रोम रोम को आँख बना कर निरखा है शायर ने और हजारों हजार सुन्दर उपमानों से सजा डाला कि जुल्फ जुल्फ न होकर गंगा स्नान को उमडती भीड से लेकर चीन के एक नगर खुतुन जहां कस्तूरी बहुत मिलती है, की महकती रातें तक बन गयी हैं। आँखें हैं कि तारों को भी लोरियां सुनाकर सुला दें। प्रेम में पगी भारतीय स्त्री गंगा, जमुना से लेकर सीता, राधा, लक्ष्मी का स्वरूप लेकर उतर आई है इन रुबाइयों में।
जब पिछले पहर प्रेम की दुनिया सो ली
कलियों की गिरह पहली किरन ने खोली
जोबन रस छलकाती उठी चंचल नार
राधा गोकुल में जैसे खेले होली

ये हल्के, सलोने, सांवलेपन का समां
जमुना के जल में और आसमानों में कहां
सीता पे स्वयंबर में पडा राम का अक्स
या चाँद के मुखडे पर है जुल्फों का धुंआ

जब प्रेम की घाटियों में सागर उछले
जब रात की बादियों में तारे छिटके
नहलाती फिजां को आई रस की पुतली
जैसे शिव की जटा से गंगा उतरे
इन अद्वितीय रुबाईयों में भारतीयता की महक अलग - अलग मौसमों से चुराई गयी है हमारी संस्कृति में मौसमों के महत्व से शायर अछूते नहीं, हर मौसम में वे स्त्री के रूप की छटा बिखेर देते हैं इन शब्दों में -
ये चैत की चाँदनी में आना तेरा
अंग अंग निखरा हुआ, लहराया हुआ
रस और सुगंध से जवानी बोझल
एक बाग है बौर आए हुए आमों का
फिराक इन रुबाईयों में एक भारतीय गृहस्थन के विभिन्न रुपों पर फिदा हैं, चाहे फिर वह बच्चे को नहलाती माँ हो या राखी बंधवाती बहन या घर को दीपकों की कतार से सजाती पत्नी।
आँगन में लिये चाँद के टुकडे क़ो खडी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद भरी
रह रह कर हवा में जो लोका देती
गूंज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
फिराक की इन रूबाईयों ने पारम्परिक भारतीय स्त्री के रूप को अमरत्व दे दिया है।
मण्डप के तले खडी है रस की पुतली
जीवन साथी से प्रेम की गांठ बंधी
महके शोलों के गिर्द भांवरों के समय
मुखडे पर नर्म धूप सी पडती हुई

आंगन में सुहागिनी नहा के बैठी
रामायण जानुओं पे रक्खी है खुली
जाडे क़ी सुहानी धूप खुले गेसू की
परछांई चमकते सफहे पर पडती हुई
फिराक की इन रुबाइयों में जहाँ हिन्दी और उर्दू का गंगा-जमनी संगम मिलता है, वहीं फारसी और अरबी के कई क्लिष्ट शब्दों को भी संजोया है और यूं संजोया है कि रुबाइयों का संगीत और रस जरा भी फीका न हो। और वे शब्द अपने आप में इतने पूर्ण और अर्थमय हैं कि उनकी जगह कोई और शब्द रुबाई के रस को कम कर सकता था। इसीलिये साथ में हिन्दी अर्थ तारांकित कर नीचे लिखे गये हैं।
इंसा के नफस(श्वास) में भी ये एजाज (ज़ादू) नहीं
तुझसे चमक उठती है अनासिर की जबीं(तत्वों का माथा)
एक मोजिजये-खामोश(मौन चमत्कार) तरजे-रफ्तार (चाल का ढंग)
उठते हैं कदम कि सांस लेती है जमीं
फिराक के इस जादू रूप की भाषा वहां भी मन मोह लेती है जहां उन्होंने दृश्य खींचने में ठेठ देशज शब्दों को शामिल किया है, मसलन -
चौके की सुहानी आंच, मुखडा रौशन
है घर की लक्ष्मी पकाती भोजन
देते हैं करछुल के चलने का पता
सीता की रसोई के खनकते बर्तन
फिराक की रूबाईयों को पढ क़र बहुत से प्रसिद्ध लोगों ने सराहना की है, यह वह समय था जब कविता विशुद्ध रसमय कविता होती थी, लोग अपनी रचनाओं की प्रशंसा न कर अपने समकालीनों की प्रशंसा किया करते थे ना कि विकट आलोचनाएं। आज कविता ऐसे ही वादों और आलोचनाओं के घेरे में अपनी पहचान खोती जा रही है -

रूप की रुबाइयों में बुद्धकाल, मुस्लिमयुग और टेगोर के युग से लेकर आज तक की भारतीय संस्कृति अपनी झलकियां दिखाती हुई नजर आती है। - सरोजिनी नायडू

फिराक ने इन रुबाईयों में मोती पिरो दिया है, इसका प्रकाशन जब भी होगा लोगों की आँखें खुल जाएंगी। - प्रेमचंद

मैं क्या कविता करता हूँ , कविता तो फिराक करते हैं। - सुमित्रानंदन पंत

प्रयाग आकर अगर तुमने फिराक के मुंह से फिराक की कविता नहीं सुनी तो व्यर्थ प्रयाग आए।- निराला

फिराक तुम जादू करते हो।- सज्जाद जहीर

ये रुबाइयां युगयुगान्तर तक भारतीय संस्कृति का अनुभव कराती रहेंगी। - डॉ राजेन्द्र प्रसाद

इन रुबाइयों ने मुझ पर गहरा असर छोडा है। ये रीडिसकवरी ऑफ इण्डिया है। - जवाहरलाल नेहरू

और सराहना के ये शब्द दिलों से निकले शब्द है क्योंकि रूप की रुबाइयां हैं ही दिलकश। रूप की अंतिम रुबाई के साथ जो एक शाश्वत सत्य है -
पैगम्बरे-इश्क हूँ समझ मेरा मकाम
सदियों में फिर सुनाई देगा ये पयाम
वो देख कि आफताब सजदे में गिरे
वो देख कि उठे देवता भी करने को सलाम